पहचान, परंपरा और प्रश्न — आदिवासी समाज के सामने खड़ा एक संवेदनशील सच?

पहचान, परंपरा और प्रश्न — आदिवासी समाज के सामने खड़ा एक संवेदनशील सच

15 फ़रवरी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया गया। यह हमारे हिंदू भाई-बहनों के लिए गर्व और आस्था का विषय है, और हम इसका सम्मान करते हैं। हर समुदाय को अपनी धार्मिक परंपराएँ निभाने का पूरा अधिकार है।
लेकिन एक आदिवासी होने के नाते मैं, रोशन टोप्पो, आज एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न उठाना चाहता हूँ।

लाठीकटा नैनिटुंगरी, ज़िला सुंदरगढ़ (ओडिशा) — यह स्थान उरांव आदिवासी समाज के पड़हा सिस्टम का पद्दा पड़हा मुख्यालय माना जाता है। यहाँ का सामाजिक-धार्मिक आधार आदि धर्म है। लंबे समय से आदिवासी समाज अपनी अलग पहचान, संस्कृति और पूजा-पद्धति को बचाए रखने की बात करता रहा है। स्वयं को हिंदू नहीं मानने की बात भी कई मंचों पर कही जाती रही है।

ऐसे में जब उसी आदिवासी पूजा-स्थल पर, समाज के मुखिया लोगों के नेतृत्व में शिवरात्रि जैसे हिंदू धार्मिक अनुष्ठान मनाए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े होते हैं।


मूल प्रश्न क्या है?

यह किसी पर्व या आस्था के विरोध का विषय नहीं है।
प्रश्न यह है कि—

  • यदि हम स्वयं को आदिवासी और आदि धर्म का अनुयायी कहते हैं,
  • यदि हम कहते हैं कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं,

तो फिर आदिवासी पूजा-स्थल पर हिंदू रीति-रिवाजों का आयोजन क्यों?

अगर किसी को हिंदू परंपरा के अनुसार पूजा करनी है, तो मंदिर मौजूद हैं, वहाँ पूजा करना पूरी तरह उचित है।
लेकिन आदिवासी आस्था-स्थल की अपनी अलग पवित्रता, परंपरा और सांस्कृतिक अर्थ है। वहाँ किसी दूसरी धार्मिक पद्धति का आयोजन करना हमारी पहचान को ही भ्रमित करता है।


विचारधारा की अस्पष्टता

आज सबसे बड़ी समस्या यही दिखाई देती है कि—

  • हमारे अगुआ/नेतृत्व की विचारधारा स्पष्ट नहीं है।
  • समाज भी दुविधा में है—पहचान क्या है, दिशा क्या है?

एक तरफ हम अलग अस्तित्व की बात करते हैं,
दूसरी तरफ उसी अस्तित्व के मूल स्थलों पर भिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

यह विरोधाभास केवल परंपरा का नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता का प्रश्न बन जाता है।

यह विरोध नहीं, आत्ममंथन है

यह लेख किसी समुदाय, धर्म या व्यक्ति के खिलाफ नहीं है।
यह केवल एक आत्ममंथन का प्रयास है—

  • क्या हम अपनी जड़ों को स्पष्ट रूप से समझ पाए हैं?
  • क्या हमारे निर्णय हमारी घोषित पहचान के अनुरूप हैं?
  • आने वाली पीढ़ियों को हम कौन-सी सांस्कृतिक दिशा दे रहे हैं?

इन सवालों से बचना आसान है,
लेकिन जवाब ढूँढना ज़रूरी है।

अंत में

आदिवासी समाज की शक्ति उसकी स्पष्ट पहचान, परंपरा और सामूहिक चेतना में है।
अगर हम स्वयं ही भ्रमित रहेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियाँ और अधिक उलझ जाएँगी।

इसलिए आज ज़रूरत विरोध की नहीं,
बल्कि स्पष्टता, संवाद और जागरूकता की है।

— रोशन टोप्पो
(कवि और लेखक)



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