"सरई के पत्तों में सजा न्योता"
आज मेरे हाथों में जो न्योता आया, उसने मुझे रोक लिया। यह कोई छपा हुआ कार्ड नहीं था, न ही किसी मोबाइल पर आया संदेश। यह सरई के पत्तों में बँधा, हल्दी लगे चावल से भरा, और बाँस की पतली खाईड़का से पिन किया हुआ वह पारंपरिक न्योता था, जो कभी हमारे आदिवासी समाज की पहचान हुआ करता था। बहुत समय बाद आज इसे देखकर ऐसा लगा, जैसे बीते हुए दिन अचानक सामने आ खड़े हुए हों।
हमारे आदिवासी समाज में पहले निमंत्रण देना कोई औपचारिक काम नहीं था, बल्कि एक संस्कार था। किसी भी शुभ अवसर से पहले घर के बड़े-बुज़ुर्ग बैठकर चावल तैयार करते थे। उन चावलों पर हल्दी लगाई जाती थी—क्योंकि हल्दी हमारे समाज में केवल रंग नहीं, बल्कि शुद्धता, मंगल और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह हल्दी लगा चावल ही न्योते का मूल होता था।
इसके बाद इन चावलों को सरई (साल) के ताज़े पत्तों में रखा जाता था। सरई का पत्ता इसलिए चुना जाता था क्योंकि वह जंगल की देन है—मजबूत, पवित्र और प्रकृति से जुड़ा हुआ। पत्ते को बड़ी सावधानी से मोड़ा जाता था, इस तरह कि चावल सुरक्षित रहें और पत्ता फटे नहीं। फिर उस पत्ते को बाँस (बैंस) की पतली स्टिक से बंद किया जाता था। यही बाँस की खाईड़का हमारी परंपरा की “पिन” होती थी—न लोहे की, न प्लास्टिक की—क्योंकि हमारा समाज हमेशा प्रकृति से लिए गए साधनों से ही अपने संस्कार निभाता रहा है।
यह छोटी-सी पोटली, जिसे कई जगह खैदका कहा जाता है, जब तैयार हो जाती थी, तब असली काम शुरू होता था। इसे लेकर लोग घर-घर पैदल जाते, हर दरवाज़े पर रुकते, हाथ जोड़कर आदर के साथ न्योता देते। यह केवल किसी कार्यक्रम की सूचना नहीं होती थी, बल्कि यह कहना होता था—आप हमारे अपने हैं, आपके बिना यह शुभ काम अधूरा है।
आज के समय में सब कुछ आसान हो गया है—कार्ड छप जाते हैं, संदेश सेकंडों में पहुँच जाते हैं। लेकिन उस आसानपन के साथ-साथ वह भावनात्मक गहराई कहीं खो गई है। शायद इसी कारण जब कई वर्षों बाद आज फिर से ऐसा पारंपरिक न्योता मिला, तो मन भर आया।
मैं, रोशन टोप्पो, इस न्योते को हाथ में लेकर खड़ा हूँ—देख रहा हूँ, महसूस कर रहा हूँ और लिख रहा हूँ। मुझे बचपन के वे दिन याद आ रहे हैं, जब गाँव में ऐसे न्योते आते थे और पूरे घर में एक अलग-सी खुशी फैल जाती थी। तब समझ नहीं थी, लेकिन आज समझ आता है कि यह न्योता हमारे समाज की आत्मा हुआ करता था।
सरई का पत्ता हमें प्रकृति से जोड़ता है, हल्दी लगा चावल मंगल का संदेश देता है और बाँस की सींक यह सिखाती है कि कम साधनों में भी गहरे संस्कार निभाए जा सकते हैं। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि हमारी संस्कृति दिखावे से नहीं, बल्कि रिश्तों और सम्मान से बनी है।
आज अगर ऐसी परंपराएँ कम दिखाई देती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे खत्म हो गई हैं। जब-जब ऐसा न्योता फिर से दिखाई देता है, तब-तब यह भरोसा लौटता है कि हमारी जड़ें अभी ज़िंदा हैं। ज़रूरत बस इतनी है कि हम उन्हें पहचानें, अपनाएँ और आगे बढ़ाएँ।
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