कुँड़ुख़ शब्द एवं उनकी ब्याख्या / कुँड़ुख़ आदिवासियों के महत्वपूर्ण शब्द

कुँड़ुख़ शब्द एवं उनकी ब्याख्या - कुँड़ुख़ आदिवासियों के महत्वपूर्ण शब्द

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अखड़ा

गाँव के मध्य विस्तृत गोलाकार स्थान जहाँ सामूहिक नृत्य,गीत, पंचायत या धार्मिक कार्य आयोजित किया जाता है।

यह अखड़ा सिर्फ कुडुख आदिवासियों में प्रसिद्ध नहीं है बल्कि पुरे आदिवासी समाज में यह अखड़ा का महत्व है

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अगूवा

⚛ कहीं-कहीं अगआ भी कहते हैं। विवाह कराने में इनकी प्रमुख भूमिका रहती है।

⚛ अगूवा वर एवं वधू दोनों पक्षो का अलग-अलग होते है।

⚛ वर की तरफ से अगूवा के नेतृत्व में कुछ लोग वधू के घर विवाह निश्चित करने जाते हैं और यदि राह में कोई अपशगुण हो जाता है तो यह टोली (गाँव) वापस लौट आती है तथा विवाह का प्रस्ताब प्रयास यहीं समाप्त कर दिया जाता हैं।

⚛ अपशगुन अगूवा धरमेस की अस्वीकृति समझता है और किसी दूसरे बधू की तालाश फिरसे शुरू करनी पड़ती है।

⚛ इसी प्रकार अपशगन का संकेत मिलने पर वधू पक्ष का भी अगुआ विवाह संबंध तोड़ सकता है।

⚛ अपसगुन न मिलने पर अगुआ की देख-रेख में विवाह सम्पन्न होता है।

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गोतर या गोत्र

⚛ पुरखों का बिस्वास है की गोत्र का विकास छोटानागपुर में हुआ है। कुडुख समाज में अपने गोत्र में विवाह-संबंध वर्जित है।

⚛ गोत्र का विचार अनेक धार्मिक कुत्यों एवं संस्कारों में किया जाता है। गोत्र की पहचान के लिए प्रत्येक गोत्र के साथ टोटम जुड़े हुए हैं।

⚛ गोत्र और टोटेम के बारे में यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं

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चला पचो

⚛ सरना बुढिया या सरना देवी। छोटानागपुर प्रवेश के पूर्व आदि धर्म में चाला-पच्चो का विकास हो चुका था।

⚛ यह कृषि की देवी मानी जाती हैं। सरना स्थल जहाँ मुण्डाओं ने गाँव की सुर्षा के लिए " हातु बॉगाक " का स्थान माना था

⚛ वहीं उरांवों के धर्म में चाला-पच्चो या सरना देवी प्रतिष्ठित हुई हैं।

⚛ सरना कोई धरम नहीं है, सरना है एक पूजा स्थल है

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यह चित्र काल्पनिक बनाया गया है चला पचो के रूप में, कुडुख आदिवासी हो या "आदि धरम " समाज में फोटो का पूजा करना बर्जित मना गया है

डंडा काटटा

⚛ इस क्रिया को पलकसना,डंडा-रेंगना या भेलवा - फाड़ी भी कहते हैं।

⚛ यह पूजा प्रायः समी मुख्य अवसरों पर अनिष्टकारी प्रभावों के निवारण हेतु किया जाता है।

⚛ उरांव एवं मुण्डा दोनों जनजातियों में यह अत्यन्त प्रचलित धार्मिक कृत्य है।

⚛ किसी शुभ कर्म के प्रारम्भ में इस पूजा का आयोजन होता है।

⚛ धरमेस की स्तुति के साथ उन्हें सफेद चवल और अण्डा अर्पित किया जाता है।

⚛ यह पूजा एक सांकेतिक चित्र बनाकर किया जाता है जिसमे कोयले का चूरा, आटा और चूल्हे की लाल मिट्टी का प्रयोग होता है।

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धर्मेश

⚛ उराओं के ईश्वर। उरांव के सृष्टिकर्ता, परमपित परमेश्वर। छोटानागपुर आने के पूर्व उरांव 'सूर्य को एक मात्र देवता मानते थे एवं उनकी पूजा करते थे।

⚛ ओराओं या कुडुख समाज में धर्मेश का दर्जा सबसे ऊपर दिया जाता है

⚛ यह अवधारणा सूर्य से ही विकसित हुई है किन्तु उरांव सूर्य को सूरज भगवा कहते हैं तथा धरमैस को भगवान मानते हैं। सफेद मुर्ग

नामे पिंजना

⚛ नामरकण संस्कार। शिशु के साथ माँ सामने रखे थाल के सम्मुख बैठती है जिसमें जल भरा होता है।

⚛ शिशु के नाम पर एक चावल जल में डाल दिया जाता है इसके उपरांत पूर्वजों का नाम लेकर एक -एक कर चावल डाला जाता है।

⚛ जिस नाम के साथ डाला गया चावल शिशु के नाम के चावल के साथ जुड़ जाता है

⚛ वही नाम शिशु का होता है। वैसे सामान्यतः बुलाने का नाम जन्म के दिन के आधार पर पड़ जाता है। जैसे-सोमरा, सोमरी., मंगरा, मंगरी आदि।

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भगत

⚛ मतियों की तरह भगत भी जादू-टोना के प्रभाव को निरस्त कर आग्रस्त रोगियों को निरोग करने में निपुण होते हैं

⚛ कई ऐसे भगत जो होते वो सादा सादा खान पान करते हैं

⚛ किन्तु इनकी कुशलता किसी प्रशिक्षष का परिणाम न होकर धर्मेश की कृपा से स्वतः प्राप्त मानी जाती हैं।

⚛ इनका खान-पान आचार विचार सात्विक नेम-धर्म युक्त होता है।

माती

माती को देंवड़ा भी कहा जाता है।

डायनों या जादू-टोना साघकों द्वारा भेजे गए रोग एवं व्याधियों तथा अन्य प्रभाबों से आग्रस्त रोगियों को ठीक करने में कुशल।

यह कुशलता गुरू परम्परा से प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त की जाती है।

माती धर्मेश की पूजा करते हैं । कभी- कभी ये नादों को भी साधते हैं तथा अपने असमियों की

स्वार्थ-पूर्ति के लिए दूसरों पर रोग-व्याधियों या अन्य मारक शक्तियाँ भेजने का कार्य भी करते है।

सरना सूप /चाला केतेर

उरांव आदि धर्म के अनुसार यह वह सूप है जिसमें सरना देवी बैठती हैं तथा सूप के साथ- साथ वह चलती रहती हैं । इसी सूप की सहायता से पाहन की चुनाव होता है।

सरना कूटी/चाला कुट्टी

⚛ पाहन के घर में एक अलग बनी कुटी या कमरा जिसमें सरना-सूप रखा जाता है।

⚛ एक खूंटी इस प्रकार गाड़ी रहती है जिस पर सूप टांगने से वेग से हवा चलने पर भी सूप नहीं हिल पाता।

⚛ सूप हिलने से सरना देवीरूष्ट होकर उरांवों को महामारी भेज सकती हैं।

⚛ यह अत्यंत पवित्र र्थान होता है जिसमें पाहन या पाहन के आदेश से ही कोई अन्य प्रवेश कर सकता है।

सिरा सीता

⚛ पारम्परिक धर्मगाथा में वर्णित वह दलदली स्थान जहाँ अग्निवर्षा के समय भाई-बहन के रूप में उरांवों के पूर्वज भइया-बहिन' सुरक्षित पाये गए थे और जिन्हें लेकर धरमेस ने उरांव जाति का विस्तार किया था।

डुमरी प्रखंड में सिरासीता नाले उर्फ ककड़ोलता है. यह एक हजार फीट से अधिक ऊंचे पहाड़ पर स्थित है. इसे आदिवासियों की उत्पत्ति स्थल माना जाता है. आदिवासी समाज की आस्था व विश्वास सिरासीता नाले से जुड़ी हुई है.

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ककड़ो लता

⚛ ककड़ोलता एक एक धार्मिक स्थल है. जब मां पार्वती भागवन शिव से नराज हो गयी थी तब भगवान शंकर ने मानवजाति को ढूंढने निकले थे. तब उन्होंने ककड़ोलता में दो भाई बहनों को घुसते हुए देखा. तब उन्होंने दोनों भाई बहनों को उस स्थान से लेकर आए और दोनों को पाला पोसा.

⚛ आदिवासियों की मान्यतानुसार (सिरासिता नाले) ककड़ोलता ही मानव उत्पत्ति हुई थी. इस स्थान के बारे में ये भी मान्यता है कि जो भी मन्नतें यहां पर मांगी जाती है वो सभी पूरी हो जाती है.

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कोहा बेंजा

⚛ महान विवाह। मृत्यु-संस्कार के अवसर पर किया गया धार्मिक कृत्य ए्वं उत्सव। यह मृत्यु संस्कार की महत्वपूर्ण किया है जिसमें मृतक का 'एखं' अपने पितरों के पच-बालर में जाकर मिल जाता है।

हाड़बोड़ी

⚛ मृत्यु संस्कार, जिसे उरांव धर्मानुसार 'कोहा बैंजा" अर्थात् महान-विवाह की संज्ञा दी जाती है

⚛ इस किया के अनुसार गोत्र की 'कुण्डी में मृतक की असि्थियों इस आग्रह से समर्पित की जाती हैं कि मृतक का एख पाताल-लोक स्थित पितरों में जाकर मिल जाये। चूंक कुण्डी में अस्थि समर्पित किया जाता है अतः सादरी भाषा में इस किया को "हड़बोड़ी" कहा जाने लगा।

⚛ यह शब्द इस प्रकार कुडुख शब्द नहीं है तथा बाहर से आरोपित है। हड़बोड़ी" कोहा-बेंजा नहीं है जैसा कि पादरियों एवं अन्य लेखकों ने इस शब्द की व्याख्या की है, अपितु यह कोहा-बेंजा के अन्तर्गत मात्र एक महत्वपूर्ण क्रिया है।

नाद

⚛ मृतक की आत्मा जिसे प्रायः ईसाई तथा अन्य अध्ययनकर्ताओं ने भूत की संज्ञा दी है।

⚛ उरंव धर्म के अनुसार नाद दो प्रकार के होते हैं एक जिनकी स्वाभाविक मृत्यु होती है तथा अन्य वे जिनकी अस्वाभाविक मृत्यु होती है।

⚛ स्वाभाविक मृत्यु के नाद पच्चबालर अर्थात् पितरों के बीच स्थान पा लेते हैं तथा अस्वाभाविक मृत्यु के नाद अतृप्त होते हैं तथा अन्य वे जिनकी अस्वाभाविक मृत्यु होती है।

⚛ स्वाभाविक मृत्यु के नाद पच्चबालर अर्थात् पितरों के बीच स्थान पा लेते हैं तथा अस्वाभाविक मृत्यु के नाद अतृप्त होते हैं तथा प्रतिशोध की भावना से उतप्रेरित लोगों के प्राण लेने एवं कष्ट देने में तृप्ति पाते हैं। कष्टमय त्रिशंकु सिथिति से, निर्धारित आयु पूर्ण होने पर मृतक की आत्मा की मुक्ति हो जाती है।

कुँड़ुख़ शब्द एवं उनकी ब्याख्या

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